जगनेर, आगरा। देश में गरीबी, बेरोजगारी और अपराध जैसी सामाजिक समस्याओं को कम करने के लिए शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की आवश्यकता पर जोर देते हुए बीएसआर इंटर कॉलेज, जगनेर के प्रधानाचार्य सुबोध कुमार शर्मा ने एक महत्वपूर्ण विचार साझा किया है। उनका मानना है कि कक्षा 6 से ही विद्यार्थियों को उद्योगपतियों, वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, डॉक्टरों और महान आविष्कारकों के जीवन संघर्ष, उपलब्धियों और समाज में उनके योगदान के बारे में पढ़ाया जाना चाहिए।
सुबोध कुमार शर्मा के अनुसार, शिक्षा का उद्देश्य केवल अच्छे अंक प्राप्त करना, बड़ी डिग्री हासिल करना और नौकरी पाना ही नहीं होना चाहिए, बल्कि विद्यार्थियों में उद्यमिता, वैज्ञानिक सोच, नवाचार और रोजगार सृजन की क्षमता भी विकसित करनी चाहिए।
केवल डिग्री नहीं, समस्याओं का समाधान करना भी सीखे नई पीढ़ी
आज बड़ी संख्या में विद्यार्थी बेहतर शिक्षा और रोजगार की उम्मीद के साथ पढ़ाई करते हैं। ऐसे में शिक्षा के साथ व्यावहारिक ज्ञान और कौशल विकास पर ध्यान देना जरूरी है। सुबोध कुमार शर्मा का कहना है कि बच्चों को बचपन से ही यह समझाया जाना चाहिए कि नए आविष्कार कैसे होते हैं, उद्योग कैसे स्थापित किए जाते हैं, बीमारियों के उपचार के लिए शोध कैसे किया जाता है और रोजगार के नए अवसर कैसे पैदा किए जा सकते हैं।
उनका सुझाव है कि पाठ्यक्रम में जीवनियों को इस तरह शामिल किया जाए कि विद्यार्थी महान व्यक्तित्वों की उपलब्धियों के साथ उनके संघर्ष, निर्णय लेने की क्षमता और समाज के प्रति जिम्मेदारियों से भी प्रेरणा ले सकें।
उद्योगपतियों की जीवन-यात्रा से मिलेगी रोजगार सृजन की प्रेरणा
सुबोध कुमार शर्मा का मानना है कि रतन टाटा, जमशेदजी टाटा, घनश्याम दास बिड़ला और धीरूभाई अंबानी जैसे उद्यमियों की जीवन-यात्रा विद्यार्थियों को व्यापार, प्रबंधन, जोखिम उठाने, नवाचार और रोजगार सृजन की समझ दे सकती है।
बच्चों को बताया जाना चाहिए कि किस तरह एक विचार या छोटे व्यवसाय को बड़े उद्योग में बदला जा सकता है और किस प्रकार उद्यमिता के माध्यम से दूसरे लोगों के लिए भी रोजगार के अवसर तैयार किए जा सकते हैं।
वैज्ञानिकों की कहानियों से विकसित होगी नई सोच
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, सी.वी. रमन, जगदीश चंद्र बोस और मैरी क्यूरी जैसे वैज्ञानिकों के जीवन से विद्यार्थियों को जिज्ञासा, प्रयोग, अनुसंधान और निरंतर प्रयास का महत्व समझाया जा सकता है।
इससे बच्चों को यह जानने का अवसर मिलेगा कि विज्ञान केवल परीक्षा पास करने का विषय नहीं है, बल्कि खेती, ऊर्जा, स्वास्थ्य, पर्यावरण और तकनीक से जुड़ी समस्याओं के समाधान का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।
इंजीनियरों के कार्यों से समझेंगे निर्माण और तकनीक का महत्व
लेखक के अनुसार, सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया जैसे महान इंजीनियरों के योगदान को पाठ्यक्रम में शामिल करने से बच्चों को इंजीनियरिंग की व्यावहारिक उपयोगिता समझने में मदद मिलेगी।
बाँध, पुल, सड़क, मशीन और आधुनिक तकनीक के विकास से जुड़े उदाहरण विद्यार्थियों में रचनात्मक सोच विकसित कर सकते हैं। इससे वे केवल नौकरी की प्रतीक्षा करने के बजाय स्थानीय समस्याओं के समाधान खोजने और नए उत्पाद विकसित करने की दिशा में भी प्रेरित हो सकते हैं।
डॉक्टरों के जीवन से सीखें सेवा और नवाचार का महत्व
चिकित्सा क्षेत्र के प्रेरक व्यक्तित्वों की जीवन-गाथाएँ विद्यार्थियों को मानव सेवा, अनुसंधान और जनस्वास्थ्य के प्रति जागरूक कर सकती हैं। डॉ. देवी प्रसाद शेट्टी जैसे चिकित्सकों के कार्यों के माध्यम से बच्चों को स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक लोगों तक पहुँचाने के प्रयासों की जानकारी दी जा सकती है।
वहीं, डॉ. वर्गीज कुरियन के योगदान से ग्रामीण अर्थव्यवस्था, दुग्ध सहकारिता और सामूहिक प्रयासों की शक्ति को समझाया जा सकता है। इससे विद्यार्थियों को यह सीख मिल सकती है कि समाज में बड़े बदलाव केवल व्यक्तिगत सफलता से नहीं, बल्कि सामूहिक प्रयासों से भी संभव होते हैं।
बाबा रामदेव सहित विभिन्न क्षेत्रों के उद्यमियों का भी हो अध्ययन
सुबोध कुमार शर्मा का सुझाव है कि योग, स्वास्थ्य-जागरूकता और उपभोक्ता उत्पादों के क्षेत्र में काम करने वाले उद्यमियों की कार्य-यात्रा को भी विद्यार्थियों के अध्ययन का हिस्सा बनाया जा सकता है।
हालाँकि, उनका जोर इस बात पर है कि किसी भी व्यक्तित्व का अध्ययन निष्पक्ष और तथ्यपरक होना चाहिए। विद्यार्थियों को उपलब्धियों के साथ संबंधित व्यक्तियों की सीमाओं, विवादों और सामाजिक जिम्मेदारियों के बारे में भी जानकारी मिलनी चाहिए, ताकि वे व्यक्तिपूजा के बजाय तथ्यों और तर्क के आधार पर अपनी समझ विकसित कर सकें।
कक्षा 6 से शुरू हो व्यावहारिक और कौशल आधारित शिक्षा
लेखक के अनुसार, केवल जीवनियाँ पढ़ाने से अपेक्षित बदलाव नहीं आएगा। इसके साथ विद्यार्थियों को छोटे विज्ञान प्रयोग, मॉडल निर्माण, व्यवसाय की प्रारंभिक योजना, स्थानीय उद्योगों का भ्रमण, वित्तीय साक्षरता और तकनीकी प्रशिक्षण जैसे अवसर भी दिए जाने चाहिए।
बच्चों को लागत और लाभ का हिसाब लगाने, वैज्ञानिक विचारों की जाँच करने, इंजीनियरिंग डिजाइन तैयार करने और स्वास्थ्य संबंधी जानकारियों को वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर समझने का अभ्यास कराया जाना चाहिए।
इस तरह की गतिविधियाँ विद्यार्थियों को किताबी ज्ञान के साथ वास्तविक जीवन की परिस्थितियों को समझने और समस्याओं का व्यावहारिक समाधान खोजने में मदद कर सकती हैं।
शिक्षा में बदलाव से गरीबी और बेरोजगारी पर कैसे पड़ेगा असर?
सुबोध कुमार शर्मा का मानना है कि यदि शिक्षा के माध्यम से बच्चों में कौशल, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, उद्यमिता और आत्मनिर्भरता की भावना विकसित की जाए, तो उनके सामने आगे बढ़ने के अधिक अवसर खुल सकते हैं।
नए व्यवसाय रोजगार पैदा करने में मदद कर सकते हैं, जबकि विज्ञान और इंजीनियरिंग उत्पादकता बढ़ाने तथा नई तकनीक विकसित करने में योगदान दे सकते हैं। बेहतर चिकित्सा और जनस्वास्थ्य सेवाएँ भी समाज के जीवन स्तर को सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
हालाँकि, गरीबी, बेरोजगारी और अपराध जैसी समस्याओं को कम करने के लिए शिक्षा में सुधार के साथ पर्याप्त रोजगार के अवसर, वित्तीय सहायता, सामाजिक सुरक्षा और न्यायपूर्ण व्यवस्था भी आवश्यक हैं।
शिक्षा का उद्देश्य रोजगार पाने के साथ रोजगार पैदा करना भी हो
अपने विचार के निष्कर्ष में सुबोध कुमार शर्मा कहते हैं कि शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य केवल डिग्रीधारी डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, अधिकारी या कर्मचारी तैयार करना नहीं होना चाहिए। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो विद्यार्थियों को नई खोज करने, उद्योग स्थापित करने, सामाजिक समस्याओं का समाधान खोजने और दूसरों के लिए अवसर पैदा करने के योग्य बनाए।
उनका मानना है कि कक्षा 6 से ही विद्यार्थियों को उद्योगपतियों की व्यावसायिक सोच, वैज्ञानिकों की जिज्ञासा, इंजीनियरों की निर्माण क्षमता और डॉक्टरों की सेवा भावना से परिचित कराया जाना चाहिए।
उनके अनुसार, देश का भविष्य केवल इस बात से तय नहीं होगा कि कितने बच्चे डिग्रियाँ हासिल करते हैं, बल्कि इससे भी तय होगा कि वे अपने ज्ञान का उपयोग समाज और देश के विकास के लिए किस तरह करते हैं।
लेखक का संदेश है कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो युवाओं को नौकरी पाने का रास्ता दिखाने के साथ रोजगार पैदा करने की क्षमता विकसित करे और मानवता की सेवा करने का संस्कार भी दे।
लेखक परिचय: सुबोध कुमार शर्मा, प्रधानाचार्य, बीएसआर इंटर कॉलेज, जगनेर, आगरा।
नोट- यह लेख लेखक द्वारा Dehatnews Today के लिए भेजे गए विचारों पर आधारित है। इसमें व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं।अगर आपके पास भी कोई आर्टिकल या कोई सूचना है तो Dehatnewstoday@gmail.com पर भेज सकते हैं

