आगरा। आज 15 अगस्त है। देशभर में आजादी का महोत्सव मनाया जा रहा है। कहीं तिरंगा फहराया जा रहा है, कहीं देशभक्ति के गीत गूंज रहे हैं और कहीं मिठाइयां बांटी जा रही हैं।
लेकिन क्या आजादी के इस महोत्सव का मतलब सिर्फ इतना ही है?
बिल्कुल नहीं।
आजादी का असली मतलब उन वीरों को याद करना भी है, जिन्होंने गुलामी के दौर में अंग्रेजी हुकूमत से लोहा लिया। उन परिवारों को याद करना है, जिन्होंने अपने बेटे खोए। उन नौजवानों को याद करना है, जिन्होंने जेल की यातनाएं सहीं और उन क्रांतिकारियों को नमन करना है, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपनी जान तक की परवाह नहीं की।
ऐसी ही एक कहानी आगरा के जगनेर क्षेत्र से जुड़े क्रांतिकारी वासुदेव गुप्त की है।
आज शायद खेरागढ़ और जगनेर क्षेत्र की नई पीढ़ी के बहुत से लोग उनका नाम न जानते हों, लेकिन करीब 86 वर्ष पहले आगरा की धरती पर उनका नाम अंग्रेजी हुकूमत के लिए चुनौती बन चुका था।
वासुदेव गुप्त का नाम 27 सितंबर 1940 को हुए चर्चित हार्डी बम कांड से जुड़ा है। यह वही घटना थी, जिसने आगरा में अंग्रेजी शासन की सुरक्षा और दहशत के दावों को खुली चुनौती दे दी थी।
आखिर कौन थे वासुदेव गुप्त?
उपलब्ध प्रकाशित विवरणों के अनुसार वासुदेव गुप्त का जन्म वर्ष 1914 में जगनेर में हुआ था। गुलामी के दौर में पले-बढ़े वासुदेव गुप्त के भीतर देश को आजाद कराने की भावना धीरे-धीरे मजबूत होती गई।
उनकी खासियत यह थी कि उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ सिर्फ क्रांतिकारी गतिविधियों का रास्ता ही नहीं अपनाया, बल्कि अपनी कलम को भी संघर्ष का हथियार बनाया।
उन्होंने ‘आशा’ नाम का पत्र निकाला। उस समय अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लिखना अपने आप में जोखिम भरा काम था। अंग्रेज सरकार ऐसी हर आवाज को दबाने की कोशिश करती थी, जो लोगों के भीतर आजादी की भावना पैदा करे।
‘आशा’ के जरिए अंग्रेजी शासन के खिलाफ विचार सामने आने लगे। इसके बाद सरकार की नजर इस पत्र पर गई और इसे दबाने की कोशिश की गई और पत्र पर प्रतिबंध लगा दिया, लेकिन वासुदेव गुप्त और उनके साथियों की गतिविधियां यहीं नहीं रुकीं।
फिर हुआ त्रिकंटक दल का गठन
प्रकाशित विवरणों के अनुसार वासुदेव गुप्त ने रोशनलाल गुप्त ‘करुणेश’ और रामप्रसाद भारतीय के साथ मिलकर ‘त्रिकंटक दल’ बनाया।
तीन क्रांतिकारी, एक उद्देश्य और सामने थी अंग्रेजी हुकूमत।
इसी क्रांतिकारी गतिविधि के दौर में आगरा ने वह घटना देखी, जिसे इतिहास में हार्डी बम कांड के नाम से जाना गया।
27 सितंबर 1940 को आगरा में राम बरात निकल रही थी।
बेलनगंज चौराहे के आसपास भारी भीड़ थी। तत्कालीन अंग्रेज कलेक्टर डी.पी. हार्डी भी राम बरात देखने के लिए बरौलिया बिल्डिंग पर मौजूद था।
बताया जाता है कि अंग्रेज कलेक्टर के लिए वहां मंच बनाया गया था और वह क्रूर और तानाशाह राम बरात देखने के लिए बैठा था।
लेकिन कुछ ही देर बाद वहां ऐसा धमाका हुआ, जिसने पूरे माहौल को बदल दिया, और उसकी आवाज से अंग्रेजी हुकुमत की जड़े हिल गयी।
अचानक बम धमाके की आवाज गूंजी।
फिर दूसरा धमाका हुआ।
राम बरात के बीच अफरा-तफरी मच गई।
अंग्रेज कलेक्टर डी.पी. हार्डी घायल हुआ। उपलब्ध विवरणों के अनुसार इस घटना में हार्डी समेत करीब 32 लोग घायल हुए।
जिस अंग्रेज अफसर का शहर में खौफ बताया जाता था, उसी पर अंग्रेजी शासन के खिलाफ क्रांतिकारियों ने हमला कर दिया था।
घटना के बाद अंग्रेजी प्रशासन में हड़कंप मच गया। पुलिस सक्रिय हुई। तलाशी और गिरफ्तारियों का दौर शुरू हुआ और सरकार उन लोगों तक पहुंचने की कोशिश करने लगी, जिन्होंने इस घटना को अंजाम दिया था।
अंग्रेजी पुलिस पहुंची वासुदेव गुप्त तक
हार्डी बम कांड के बाद पुलिस की कार्रवाई तेज हुई और वासुदेव गुप्त अंग्रेजों की गिरफ्त में आ गए।
अंग्रेजी पुलिस के सामने सबसे बड़ा सवाल था कि इस घटना में कौन-कौन शामिल था? योजना किसने बनाई थी और बाकी क्रांतिकारी कहां थे?
प्रकाशित विवरणों के अनुसार वासुदेव गुप्त पर दबाव बनाया गया और पूछताछ की गई, लेकिन उन्होंने अपने साथियों के बारे में जानकारी देने से इनकार कर दिया।
यही बात उनकी कहानी को और महत्वपूर्ण बनाती है।
अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार तो कर लिया था, लेकिन उनके साथियों तक पहुंचने के लिए जरूरी जानकारी हासिल नहीं कर सके।
एक क्रांतिकारी की कहानी सिर्फ उसके साहस की नहीं होती, बल्कि उसके साथियों के प्रति उसकी निष्ठा की भी होती है।
आगरा से बर्लिन तक पहुंची धमाके की गूंज
हार्डी बम कांड की चर्चा सिर्फ आगरा तक सीमित नहीं रही।
उपलब्ध प्रकाशित विवरणों के अनुसार इस घटना का उल्लेख बर्लिन रेडियो तक पर हुआ।
कल्पना कीजिए, आगरा में राम बरात के दौरान हुआ एक बम धमाका और उसकी खबर विदेश तक पहुंचना। यह घटना उस समय अंग्रेजी शासन के लिए कितनी बड़ी चुनौती रही होगी, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है।
क्रांतिकारी वासुदेव गुप्त का संघर्ष
वासुदेव गुप्त की कहानी सिर्फ बम कांड तक सीमित नहीं थी। उन्होंने गुलामी के खिलाफ कलम भी उठाई और क्रांतिकारी गतिविधियों में भी भाग लिया। वह ऐसे दौर में सक्रिय थे, जब अंग्रेजी सरकार के खिलाफ आवाज उठाना गिरफ्तारी, यातना और जेल का कारण बन सकता था।
आज हम अपने मोबाइल फोन से कुछ सेकेंड में अपनी बात हजारों लोगों तक पहुंचा सकते हैं। लेकिन उस दौर में अंग्रेजी शासन के खिलाफ एक पत्र निकालना और उसे लोगों तक पहुंचाना भी बड़ी चुनौती थी। फिर भी वासुदेव गुप्त ने यह रास्ता चुना।
आजादी के बाद भी नहीं भूले गए
15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ।
लेकिन आजादी की लड़ाई में योगदान देने वाले सेनानियों को याद करने का सिलसिला जारी रहा।
परिवार से जुड़े प्रकाशित विवरणों के अनुसार 15 अगस्त 1972 को, स्वतंत्रता की 25वीं वर्षगांठ के अवसर पर वासुदेव गुप्त को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की ओर से स्वतंत्रता संग्राम में योगदान के लिए ताम्रपत्र प्रदान किया गया।
इसके बाद 19 अगस्त 1989 को उनका निधन हुआ।
आगरा में उनके नाम से विद्यालय
वासुदेव गुप्त की स्मृति आज भी आगरा में मौजूद है। उनके नाम से क्रांतिकारी वासुदेव गुप्त पब्लिक इंटर कॉलेज संचालित होने की जानकारी सामने आती है। जिसको उनके परिवार के लोग चला रहे हैं।
जिस व्यक्ति ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष किया, आज उसी के नाम से बच्चे शिक्षा हासिल कर रहे हैं।
यह इतिहास की एक खूबसूरत तस्वीर है।
एक दौर में वासुदेव गुप्त ने देश की गुलामी के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी और आज उनके नाम से नई पीढ़ी अपने भविष्य को संवार रही है।
15 अगस्त पर हमें क्या याद रखना चाहिए?
जब आज हम तिरंगा फहराते हैं तो हमें यह भी याद रखना चाहिए कि इस तिरंगे को सम्मान के साथ फहराने का अधिकार हमें यूं ही नहीं मिला।
इसके पीछे लाखों लोगों का संघर्ष था।
किसी ने जेल की सजा काटी।
किसी ने अंग्रेजों की यातनाएं सहीं।
किसी ने अपना घर-परिवार छोड़ा।
और किसी ने अपनी जान तक की परवाह नहीं की।
जगनेर की मिट्टी से जुड़े वासुदेव गुप्त भी उन्हीं संघर्षशील लोगों में एक नाम हैं।
आज अगर आप जगनेर क्षेत्र से हैं तो यह कहानी आपके लिए और भी खास हो जाती है।
क्योंकि यह किसी दूर शहर के इतिहास की कहानी नहीं है।यह उस क्षेत्र की कहानी है, जिसकी मिट्टी से एक ऐसा नौजवान निकला जिसने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाई।
इतिहास की कहानियां तभी जिंदा रहती हैं, जब उन्हें अगली पीढ़ी तक पहुंचाया जाता है।
इसलिए इस 15 अगस्त पर सिर्फ तिरंगा न फहराएं।
अपने बच्चों को यह भी बताएं कि आजादी की कीमत क्या थी।
उन्हें उन लोगों के बारे में बताएं, जिनके संघर्ष की वजह से आज हम आजाद भारत में सांस ले रहे हैं।
उनमें एक नाम है—
क्रांतिकारी वासुदेव गुप्त।
जगनेर की धरती से जुड़ा एक क्रांतिकारी नाम।
आगरा के इतिहास में दर्ज एक साहसिक अध्याय।
और हार्डी बम कांड से अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती देने वाले उन क्रांतिकारियों में से एक, जिन्हें याद करना आज भी हमारी जिम्मेदारी है।
आजादी के इस पर्व पर क्रांतिकारी वासुदेव गुप्त सहित देश के सभी ज्ञात-अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों को शत-शत नमन।
जय हिंद। वंदे मातरम्।