जगनेर, आगरा। शिक्षक दिवस के अवसर पर Dehat News Today के लिए सुबोध कुमार शर्मा, प्रिंसिपल BSR इंटर कॉलेज, जगनेर ने अपने परिवार की तीन पीढ़ियों की शिक्षा-यात्रा और शिक्षक परंपरा को शब्दों में पिरोया है।
यह लेख उनके परिवार में वर्ष 1945 से शुरू हुई शिक्षण परंपरा की कहानी बताता है, जिसमें स्व. सालिग्राम शर्मा जी, स्व. डॉ. नरेंद्र कुमार शर्मा और स्वयं सुबोध कुमार शर्मा ने अलग-अलग दौर में शिक्षा के क्षेत्र में योगदान दिया। लेखक ने इस विरासत को केवल पारिवारिक उपलब्धि नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति एक जिम्मेदारी के रूप में प्रस्तुत किया है।
यह लेख उनके परिवार में वर्ष 1945 से शुरू हुई शिक्षण परंपरा की कहानी बताता है, जिसमें स्व. सालिग्राम शर्मा जी, स्व. डॉ. नरेंद्र कुमार शर्मा और स्वयं सुबोध कुमार शर्मा ने अलग-अलग दौर में शिक्षा के क्षेत्र में योगदान दिया। लेखक ने इस विरासत को केवल पारिवारिक उपलब्धि नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति एक जिम्मेदारी के रूप में प्रस्तुत किया है।
Dehat News Today इस लेख को ‘पाठक की कलम से’ विशेष श्रृंखला के तहत प्रकाशित कर रहा है। प्रस्तुत विचार एवं अनुभव लेखक के व्यक्तिगत हैं।
तीन पीढ़ियाँ… एक दीपक… और शिक्षा की अनवरत यात्रा
1945 से आज तक — एक शिक्षक परिवार की ज्ञान-गाथा
“धन-संपत्ति पीढ़ियों तक सुरक्षित रहे, यह उपलब्धि हो सकती है;
लेकिन यदि ज्ञान और संस्कार पीढ़ियों तक सुरक्षित रहें, तो वह विरासत कहलाती है।”
शिक्षक दिवस केवल शिक्षकों को धन्यवाद कहने का दिन नहीं है। यह उस परंपरा को नमन करने का अवसर है, जिसमें किसी व्यक्ति ने अपना जीवन स्वयं के लिए नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन को प्रकाश देने के लिए समर्पित कर दिया।
आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो महसूस होता है कि हमारे परिवार की सबसे बड़ी पूँजी कोई जमीन, मकान या संपत्ति नहीं रही—हमारी सबसे बड़ी विरासत शिक्षा रही है।
🪔 1945 — जब एक दीपक जला
इस यात्रा का आरंभ स्व. सालिग्राम शर्मा जी से हुआ।
शिक्षण कार्य: 1945 से 1984 तक।
वर्ष 1945 में उन्होंने शिक्षा को अपने जीवन का उद्देश्य बनाया। उस समय परिस्थितियाँ आज जैसी सुविधाजनक नहीं थीं। संसाधन सीमित थे, लेकिन ज्ञान बाँटने का संकल्प असीमित था।
उन्होंने केवल विद्यार्थियों को पढ़ाया नहीं, बल्कि उन्हें जीवन को समझने की दृष्टि देने का प्रयास किया। उनके लिए शिक्षक होना एक नौकरी नहीं, बल्कि समाज के भविष्य को गढ़ने का उत्तरदायित्व था।
उनके हाथों में किताब थी, लेकिन उनके हृदय में आने वाली पीढ़ियों का भविष्य।
🌳 दूसरी पीढ़ी ने उस वृक्ष को सींचा
पिता से मिले संस्कारों को जीवन का आधार बनाकर स्व. डॉ. नरेंद्र कुमार शर्मा ने शिक्षा की इस परंपरा को आगे बढ़ाया।
शिक्षण कार्य: 1986 से 2016 तक।
उन्होंने शिक्षा को केवल ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं माना, बल्कि व्यक्ति निर्माण का सबसे प्रभावी साधन माना।
एक पीढ़ी ने जो बीज बोया था, दूसरी पीढ़ी ने उसे वृक्ष बनाया। विद्यार्थियों को पढ़ाना, उनका मार्गदर्शन करना और उनके भीतर बेहतर इंसान बनने की भावना जगाना—यही इस यात्रा की वास्तविक उपलब्धि रही।
आज वे हमारे बीच भले ही शारीरिक रूप से उपस्थित नहीं हैं, लेकिन उनके विचार, संस्कार और शिक्षा के प्रति समर्पण आज भी जीवित हैं।
कुछ लोग चले जाते हैं,
लेकिन उनके द्वारा जलाया गया दीपक कभी नहीं बुझता।
🌱 तीसरी पीढ़ी — परंपरा अब जिम्मेदारी बन चुकी है
इसी विरासत को आगे बढ़ाने का अवसर मुझे मिला।
सुबोध कुमार शर्मा
प्रिंसिपल, BSR इंटर कॉलेज, जगनेर, आगरा
शिक्षण कार्य: 2010 से आज तक।
मेरे लिए शिक्षक होना केवल एक पद नहीं है। यह उन दो पीढ़ियों की विरासत को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी है, जिन्होंने अपना जीवन शिक्षा के लिए समर्पित किया।
जब किसी विद्यार्थी की आँखों में समझ की चमक दिखाई देती है, जब कोई बच्चा अपनी कठिन परिस्थिति से निकलकर सफलता प्राप्त करता है, जब कोई विद्यार्थी अपने पैरों पर खड़ा होकर समाज के लिए कुछ करने का संकल्प लेता है—तब लगता है कि शिक्षा का वास्तविक अर्थ यही है।
शिक्षक का सबसे बड़ा पुरस्कार कोई पद, सम्मान या प्रमाणपत्र नहीं होता।
उसका सबसे बड़ा पुरस्कार होता है—अपने विद्यार्थी को सफल और अच्छा इंसान बनते देखना।
📜 1945 से आज तक…
स्व. सालिग्राम शर्मा जी → स्व. डॉ. नरेंद्र कुमार शर्मा → सुबोध कुमार शर्मा
तीन पीढ़ियाँ, अलग-अलग समय, अलग-अलग परिस्थितियाँ…
लेकिन उद्देश्य एक—
“ज्ञान बाँटना, संस्कार देना और समाज को बेहतर बनाना।”
यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं है। यह उस भारतीय परंपरा की कहानी है जहाँ गुरु को केवल पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन का मार्गदर्शक माना गया।
आज की पीढ़ी के सामने तकनीक है, इंटरनेट है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता है, ज्ञान के अनगिनत स्रोत हैं। लेकिन इन सबके बीच भी शिक्षक का महत्व कम नहीं हुआ है।
क्योंकि जानकारी मशीन दे सकती है, लेकिन ज्ञान का विवेक शिक्षक देता है।
पुस्तक उत्तर दे सकती है, लेकिन सही प्रश्न पूछना शिक्षक सिखाता है।
तकनीक सुविधा दे सकती है, लेकिन संस्कार मनुष्य को श्रेष्ठ बनाते हैं।
🌺 शिक्षक दिवस पर एक भावपूर्ण प्रणाम
आज शिक्षक दिवस के अवसर पर मैं अपने पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक नमन करता हूँ, जिन्होंने शिक्षा की वह लौ जलाई जिसे आज भी आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहा हूँ।
1945 में जला वह दीपक आज भी जल रहा है।
उसकी लौ बदलती पीढ़ियों के साथ आगे बढ़ती रही,
लेकिन उसका प्रकाश कभी कम नहीं हुआ।
मेरे लिए यह विरासत गर्व से अधिक एक जिम्मेदारी है।
आने वाली पीढ़ियों तक यह संदेश पहुँचे—
“शिक्षा कमाई नहीं, कमाल है।
ज्ञान संपत्ति नहीं, विरासत है।
और शिक्षक होना केवल पेशा नहीं, समाज के भविष्य के प्रति एक संकल्प है।”
1945 में जला वह दीपक आज भी जल रहा है।
उसकी लौ बदलती पीढ़ियों के साथ आगे बढ़ती रही,
लेकिन उसका प्रकाश कभी कम नहीं हुआ।
मेरे लिए यह विरासत गर्व से अधिक एक जिम्मेदारी है।
आने वाली पीढ़ियों तक यह संदेश पहुँचे—
“शिक्षा कमाई नहीं, कमाल है।
ज्ञान संपत्ति नहीं, विरासत है।
और शिक्षक होना केवल पेशा नहीं, समाज के भविष्य के प्रति एक संकल्प है।”
🙏 सभी गुरुजनों को शत-शत नमन
🌹 शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ 🌹
— सुबोध कुमार शर्मा
प्रिंसिपल, BSR इंटर कॉलेज, जगनेर, आगरा
संपादकीय टिप्पणी
शिक्षक दिवस के अवसर पर प्रकाशित यह लेख एक परिवार की तीन पीढ़ियों के माध्यम से शिक्षा और शिक्षक की भूमिका को देखने का एक व्यक्तिगत दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। Dehat News Today ऐसे स्थानीय लेखकों और पाठकों की रचनाओं को मंच देने का प्रयास करता है, जिनके अनुभव और विचार समाज के लिए उपयोगी हो सकते हैं।
लेख भेजने के लिए: dehatnewstoday@gmail.com
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